बुढ़ापा एक नया बचपन
सुनो ...!
हम मिलेंगे एक बार जरूर
बुढापे में लकड़ी लेकर
आऊंगी मैं तुमसे मिलने...
जानते हो क्यों??
क्योंकि उस समय
कोई बंदिशें नहीं होंगी
ना तुम्हारे ऊपर ,ना मेरे ऊपर
वो दौर भी कैसा होगा ।
कितना सुन्दर कितना खुशहाल,,
ना किसी का डर होगा,
ना कोई दायरे ....
तुम आओगे ना मुझसे मिलने ?
आँखों पर मोटा-सा चश्मा होगा
उस चश्मे से निहारूगी
तुम्हारी जुल्फों को
तुम रख देना सर अपना
हौले से मेरे कंधे पर
मैं संवार दूंगी तुम्हारी ज़ुल्फ़ों को
अपने झुर्री पड़े...कोमल हाथों से..!
सुनो तुम...
एक सपना देखा हैं मैंने भी
आखिर सपने देखना भी तो
तुमने ही सिखाया...
कहो ना !...
तुम मुकम्मल करोगे ना ?
मेरे इस सपने को ..!
मैं छूना नहीं चाहती तुम्हें
बस हवाओं की हर पुरवाई में
महसूस करना चाहती हूँ
बेहद करीब से...
तुम्हारे सुवास में
अपने अहसास को
ख़ुदा की इबादत की तरह
बोलो ना !!
आओगे ना तुम मुझसे मिलने...?💕