●|||मुझे याद है आज भी नानी मां का गांव|||●
आज भी नहीं भूली हूँ मैं नानी माँ का गाँव।
कितना सुखद था वो मेरा बचपन का पड़ाव।
शहर में सारी सुख-सुविधाएँ फिर भी नहीं सुकून,
ग्राम्य जीवन था दुष्कर पर नहीं था वहाँ तनाव॥
थी वो कच्ची हवेली जहाँ पर मैंने आँखें खोली।
मेरी प्यारी नानी थी वो अति सीधी और भोली।
बहुत मिली मुझको उनकी ममता पूरित छाँव।
आज भी नहीं भूली हूँ मैं नानी माँ का गाँव॥
याद है मुझको सागौर गाँव का वो पुरबिया बाखल।
घर के सम्मुख कुएँ पर सदा रहती थी हलचल।
मंदिर में घंटी बजाने का मुझको बड़ा था चाव।
आज भी नहीं भूली हूँ मैं नानी माँ का गाँव॥
दिनभर धींगामस्ती करती हम बच्चों की टोली।
कभी खेलते गुल्ली-डंडा कभी खेलते गोली।
खेल-खेल में रोजाना ही लग जाता था घाव।
आज भी नहीं भूली हूँ मैं नानी माँ का गाँव॥
कल-कल करती कटी नदी पर पानी भरने जाते।
संग मित्रों के बहते जल में कूद-कूद कर नहाते।
बारिश में हम देखा करते नदी का तेज बहाव।
आज भी नहीं भूली हूँ मैं नानी माँ का गाँव॥
कितना रुचिकर लगता था गाय-बैलों को हाँकना।
छकड़ा-बैलगाड़ी में बैठकर हिचकौले खाना।
जंगल जाने,पहाड़ पर चढ़ने का था मुझे लगाव।
आज भी नहीं भूली हूँ मैं नानी माँ
आज भी नहीं भूली हूँ मैं नानी माँ का गाँव।
कितना सुखद था वो मेरा बचपन का पड़ाव।
शहर में सारी सुख-सुविधाएँ फिर भी नहीं सुकून,
ग्राम्य जीवन था दुष्कर पर नहीं था वहाँ तनाव॥
थी वो कच्ची हवेली जहाँ पर मैंने आँखें खोली।
मेरी प्यारी नानी थी वो अति सीधी और भोली।
बहुत मिली मुझको उनकी ममता पूरित छाँव।
आज भी नहीं भूली हूँ मैं नानी माँ का गाँव॥
याद है मुझको सागौर गाँव का वो पुरबिया बाखल।
घर के सम्मुख कुएँ पर सदा रहती थी हलचल।
मंदिर में घंटी बजाने का मुझको बड़ा था चाव।
आज भी नहीं भूली हूँ मैं नानी माँ का गाँव॥
दिनभर धींगामस्ती करती हम बच्चों की टोली।
कभी खेलते गुल्ली-डंडा कभी खेलते गोली।
खेल-खेल में रोजाना ही लग जाता था घाव।
आज भी नहीं भूली हूँ मैं नानी माँ का गाँव॥
कल-कल करती कटी नदी पर पानी भरने जाते।
संग मित्रों के बहते जल में कूद-कूद कर नहाते।
बारिश में हम देखा करते नदी का तेज बहाव।
आज भी नहीं भूली हूँ मैं नानी माँ का गाँव॥
कितना रुचिकर लगता था गाय-बैलों को हाँकना।
छकड़ा-बैलगाड़ी में बैठकर हिचकौले खाना।
जंगल जाने,पहाड़ पर चढ़ने का था मुझे लगाव।
आज भी नहीं भूली हूँ मैं नानी माँ

